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शनिवार, जनवरी 07, 2012

घर के शेर

बाहर घिग्घी बंधती , हम हैं घर के शेर ।
कंगारू भारी पड़े , किया हमें यूं ढेर ।।
किया हमें यूं ढेर , नहीं चल पाया कोई ।
एक के बाद एक , दनादन विकेट खोई ।।
शेर कहेगा कौन , कौन देगा अब आदर ।
क्या तुम्हारा खेल , जीत ना सकते बाहर ।।

* * * * *

2 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बहुत सुन्दर, एक और सब्द भी है इनके लिए --- गली के ......!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सटीक लिखा है आपने तो!

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