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बुधवार, जनवरी 11, 2012

डराता हमको वाका

वाका के मैदान पर , दिखती पिच पर घास ।
सकते  में  दीवार भी , उड़ते  होश - हवास ।।
उड़ते  होश - हवास , पार  कैसे  पाएंगे ।
सिडनी में थे पस्त , मार अब भी खाएंगे ।।
शेर न रहा दहाड़ , रास नहीं ये इलाका ।
कहे विर्क कविराय , डराता हमको वाका ।।

* * * * *

6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बढ़िया कुण्डलिया!

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बढ़िया रचना

Gyan Darpan
..

रविकर ने कहा…

खिलाड़ियों के खिलाड़ी
बहुत बहुत बधाई ||

malkhan singh ने कहा…

मुझे तो शकीरा का वाका वाका याद आ रहा है. :)

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

kricket ka doha...:)))

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अपने रन बांकुरे तो हमेशा डरे रहते हैं बाहर देशों की पिच पर ...

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