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बुधवार, सितंबर 21, 2016

खेल नीति को समझिए, क्रिकेट को कोसना छोडिए

जब-जब भारतीय हॉकी टीम कहीं हारती है, जब-जब विश्व स्तरीय खेलों में भारत की फजीहत होती है, सारा दोष क्रिकेट के माथे मढ़ा जाता है । पिछले दिनों यह प्रवृत्ति पूरे शबाब पर थी । रियो से रोज निराशाजनक समाचार आते और मीडिया और सोशल मीडिया पर रोज क्रिकेट को कोसा जाता । रियो ओलम्पिक खत्म हो गया है, अब सारा मीडिया क्रिकेट की गतिविधियों पर नजरें गड़ाए हुए है । अब किसी को क्रिकेट में कोई बुराई नजर नहीं आ रही ।
                   यह बात निस्संदेह सच है क्रिकेट को कोसने वाले तमाम लोग देश प्रेमी हैं । कोई भी व्यक्ति चाहे उसे खेल की जानकारी हो या न हो जब भारत की हार की खबर सुनता है तो वह दुखी होता है । उसका दुःख गुस्से में बदलता है तो कोपभाजन का शिकार होती है क्रिकेट । लेकिन यह बात सोचने की है कि क्या एक खेल दूसरे खेल को प्रभावित कर सकता है ? अगर ऐसा होता तो अमरीका जैसे देश भी किसी एक खेल में आगे होते । यह ठीक है कि वे क्रिकेट नहीं खेलते लेकिन वे वॉलीबॉल, बास्केटबॉल खेलते हैं । इंग्लैण्ड क्रिकेट खेलता है और ओलम्पिक में उसकी स्थिति अच्छी रहती है । जर्मनी फ़ुटबाल, हॉकी खेलता है । ऐसे अनेक उदाहरण हैं , फिर भारत में ही ऐसा कैसे हो रहा है कि क्रिकेट के कारण अन्य खेल प्रभावित हो रहे हैं । दरअसल क्रिकेट नहीं खेल नीति इसके लिए जिम्मेदार है ।
                   ओलम्पिक में व्यक्तिगत पदकों की बात करें तो आजादी के पहले दो और एक पदक 1952 में मिला । इसके बाद पदक का सूखा शुरू हुआ जो 1996 में लिएंडर पेस ने खत्म किया । 2000 में कर्णम मल्लेश्वरी, 2004 में राज्यवर्धनसिंह राठौर ने पदक जीता । 2008 में तीन पदक मिले जो अभिनव बिंद्रा, विजेंद्र और सुशील को मिले । 2012 की स्थिति कुछ अच्छी थी, इस बार 6 पदक मिले और सुशील कुमार एकमात्र ऐसा खिलाड़ी बना जिसने दूसरी बार पदक जीता । बाकि पांच खिलाड़ी नए थे, जो गगन नारंग, विजय कुमार, योगेश्वर, साइना नेहवाल और मैरीकॉम थे । 2016 में यही किस्सा दोहराया गया और दोनों पदक नए खिलाडियों पी वी संधू और साक्षी मलिक को मिले । सोचने की बात है कि कोई भी खिलाड़ी अपने प्रदर्शन को दोहरा क्यों नहीं पाया । अक्सर कहा जाता है कि सुविधाओं का अभाव है, लेकिन यह कहाँ नहीं । क्रिकेट में क्या यह ग्राउंड लेवल पर हैं । क्या सुनील गावस्कर, कपिल देव, सचिन तेंदुलकर को सरकारी सहायता से कोंचिग मिली ? भारत की खेल नीति की कमजोरी यही है कि यह ग्राउंड लेवल पर कुछ नहीं करती और विजेता खिलाडियों को सिर आँखों में बैठा लेती है । क्रिकेट में सफलता के बाद उतना ईनाम कभी नहीं दिया जाता जितना ओलम्पिक विजेता को मिलता है, जीत के बाद पैसा और नौकरी देकर सरकार वाहवाही तो लूट लेती है लेकिन इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि खिलाडी के लिए उम्र भर का जुगाड़ हो जाता है, हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता कि इसके बाद वे जीतना नहीं चाहते लेकिन ओलम्पिक जैसे खेल चार वर्ष बाद आते हैं और चार वर्ष बाद वही प्रदर्शन दोहराना कठिन होता है | वे खिलाडी प्रदर्शन दोहरा नहीं पाते और नए खिलाडियों को आपने तैयार नहीं किया तो मैडल कहाँ से मिलेंगे ?
            क्रिकेट में भी खूब धन खिलाड़ियों पर लुटाया जाता है, लेकिन यह बोर्ड लुटाता है और तभी तक लुटाता है, जब तक खिलाड़ी अच्छा खेलता है | वर्तमान की बात करें तो युवराज, गंभीर जैसे अनेक खिलाड़ी टीम में आने को तरस रहे हैं | यह बात उनमें निरंतर अच्छा प्रदर्शन करने की ललक पैदा करती है, इसके अतिरिक्त बोर्ड जिस प्रकार से घरेलू खेल और आई.पी.एल. जैसे आयोजन करके लोगों में क्रिकेट के प्रति उत्साह जगाए रखता है, वैसा अन्य खेल नहीं कर पाते क्योंकि उनके पास मजबूत बोर्ड नहीं और सरकार कुछ नहीं करती | अगर क्रिकेट का नियन्त्रण बोर्ड के पास न होकर सरकार के पास होता तो इस खेल की स्थिति भी ऐसी ही होनी थी, क्योंकि सरकार सिर्फ वाहवाही लूटने में यकीन रखती और लोग क्रिकेट को कोसने में |
                   2016 से पहले ही 2020 की तैयारी शुरू हो गई थी और 2018 आते ही 2024 के ओलम्पिक की रणनीति बनने लगेगी | मैडल न 2020 में आने हैं न 2024 में | क्रिकेट को कोसने वाले भी क्रिकेट में ही मजा लेंगे | दीपा की तारीफ़ करने वाले भी जल्द ही भूल जाएँगे कि जिमनास्ट भी कोई खेल है | हॉकी, टेनिस, बेडमिंटन के खिलाडी भले समय-समय पर सुर्खियाँ बटोरते रहें लेकिन टेनिस में हम पेस का विकल्प अब तक तैयार नहीं कर पाए | सिंगल विजेता खिलाडी मिलना तो नामुमकिन-सा है, युगल में भी भारतीय तभी जीतते हैं जब वे विदेशियों के साथ होते हैं | ओलम्पिक में यह संभव नहीं | हॉकी के लिए भी लीग का आयोजन होता है लेकिन ऐसा लगता है जैसे हॉकी तो भारतीय खेलना ही भूल गए हैं | इस बार के प्रदर्शन को दोहराया जाता रहे, यही काफी लगता है | बेडमिंटन में चार साल बाद क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता | कुश्ती और बोक्सिंग से जो उम्मीदें पिछले कुछ वर्षों में जगी थी, वो इस बार धूमिल हुई हैं | अगर अभी भी जमीनी स्तर पर खेल को महत्त्व न दिया गया, तो हालात नहीं बदलने वाले |
                सरकार का काम सरकार ही कर सकती है, लेकिन लोगों को क्रिकेट को कोसने की बजाए व्यवस्था को कोसना चाहिए  | आम भारतीय हर उस क्षण में खुश होता है जब किसी भी खेल में भारत जीतता है | अच्छी हो या बुरी, क्रिकेट कम-से-कम खुश होने के पल तो देती है | आइए रियो को भूलकर भारत-न्यूजीलैंड श्रृंखला में भारत की जीत की उम्मीद लगाई जाए |
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दिलबागसिंह विर्क 
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3 टिप्‍पणियां:

Parul Kanani ने कहा…

bilkul ..fault system mein hai so criticise karne ki jagah hume ..sudhar ki disha mein kadam badhana chahiye!

रश्मि शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़ि‍या...बि‍ल्‍कुल सही कहा आपने।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (30-09-2016) के चर्चा मंच "उत्तराखण्ड की महिमा" (चर्चा अंक-2481) पर भी होगी!
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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